Friday, May 1, 2015
Friday, April 3, 2015
Monday, March 23, 2015
ग़ज़ल
सिवा मेरे घर के ठिकाने कहाँ हैं
गए रूठ कर फिर वो जाने कहाँ हैं
बने चाहे वो ‘रब’ हमारी बला से
हमें हाथ उससे मिलाने कहाँ हैं
गगन में भटकते हैं अब भूखे पंछी
वो पानी के कुंडे, वो दाने कहाँ हैं
वो दिल मेरा रखने को करते हैं वादे
उन्हें वरना वादे निभाने कहाँ हैं
वज़िद हैं अगर यूँ ही वो रूठने पर
तो हमको भी ‘कलकल’ मनाने कहाँ हैं
राजेंद्र कलकल
नई दिल्ली, भारत
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